भारत में वाइयलिन का आगमन  

वाइयलिन का इतिहास 

शब्द "वायलिन" मध्यकालीन लैटिन विश्व विटुला से निकला है, जिसका अर्थ है "स्ट्रिंग साधन।" विटुला को विटुलरी से माना जाता है, जिसका अर्थ है "हर्षित होना"।

मध्यकाल यूरोप में  दो अलग-अलग तार वाद्यों का परिवार विकसित हुआ: एक जो चौकोर आकार में था और उसे पैरों के बीच रखते थे और दूसरा हाथो में रखा जाता था। दोनों ने ही बड़ी सफलता प्राप्त करी।लेकिन समय के साथ हाथ में रखे गए वाद्य यंत्र अधिक लोकप्रिय हो गए और 1600 में और आसपास वायलिन का विकास हुआ।

सोलहवीं शताब्दी के मध्य में वायलिन को दुनिया में पेश किया गया था, लेकिन चौदहवीं शताब्दी में लगभग इसी तरह का दिखने वाला एक यंत्र बनाया गया था, जिसे वीयोल कहा जाता था। यह 

वीयोल परिवार के वाद्यों में वायलिन का f- आकार का ध्वनि छेद नहीं था, बल्कि एक C- आकार का ध्वनि छेद या कुछ और सजावटी आकार था।वीयोल वायलिन से अलग है कि इसमें अधिक तार समाहित थे , एक फ़्रेड  वाला फ़िंगर बोर्ड,और इसका मोटा शरीर था ।

वायलिन के सामान्य डिजाइन को 16 वीं शताब्दी में मानकीकृत किया गया था।

आधुनिक वायलिन यूरोप में विकसित किया गया था,

सदियों से भारत दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है ,इसी कारण दुनियां के अनेक शासक यहाँ आये और यहाँ कि सभ्यता और संस्कृति से प्रभावित हुए। परिणाम स्वरूप उत्तर भारतीय संगीत में भी कई नए बदलाव दिखे और देश विदेश के कई वाद्यों को भारतीय संगीत से परिचित कराया गया।

उन्ही में से एक वाद्य था “वायलिन” ।

 वायलिन  18वी -19वी शताब्दी में भारत के कलाकारों के सामने प्रस्तुत हुआ। अपनी स्निग्ध, सुमधुर, कर्णप्रिय ध्वनि तथा मनमोहक आकृति से भारतीय कलाकारो को अत्यधिक प्रभावित किया जिसके फल स्वरूप भारतीयों तंत्रकारो ने अथक परिश्रम से इसका तकनीकी विकास हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के अनुरूप किया। समय के साथ कई कलाकारों ने अपनी संगीत की समझ से इस वाद्य पर नवीन तकनिको का निर्माण किया और उसे साध कर प्रतिष्ठित करने में सफल रहे। 

​भारतीय कलाकारों ने वाइयलिन को बेला नाम दिया और उसकी मेलन विधि,धारण विधि एवं वादन विधि को पूरी तरीक़े से अपने संगीत कि अनुकूल परिवर्तित कर दिया ।

Chinmay gaur 

​मेलन विधि 

मेलन विधि का अर्थ है ,वाद्य के तारो को इस प्रकार चढ़ाना या उतारना की किसी भी प्रकार का गीत संगीत वादक आसानी से और मधुरता से बजा सके ।

वैश्विक मेलन विधि

G D A E

भारतीय मिलन विधि 

C G C G अथवा G C G C 

 याद रहे मेलन विधि का लक्ष्य सही स्वर एवं मधुरता के साथ साथ किसी निश्चित प्रकार के संगीत को सरलता पूर्वक वाद्य पर उतरना है ।

उधारण हेतु ,भारतीय मेलन विधि में 

C G C G अथवा G C G C के   उपयोग से हम रागों एवं अन्य देशी संगीत को सरलता पूर्वक बजा सकता है जबकि  

वैश्विक मेलन विधि G D A E पर यह कठिन साबित होगा और कई समस्याएँ भी उत्पन्न होगी ।

​देश के कई महान वाइयलिन कलाकारो कि दर्शन ज़रूर करे ।